बजाज ऑटो कंपनी । ८० के दशक में बजाज स्कूटर की इतनी डिमांड हुआ करतीं थी; के स्कूटर की डिलीवरी के लिए कम से कम डेढ़ साल का वेटिंग पीरियड हुआ करता था । वहीं बजाज जिसने २००० साल में टू विलर में कुछ नहीं कमाया । और वही कंपनी आज इतनी सफलता पा रही हैं । क्या है बजाज ऑटो की इस कामयाबी का राज?
हमारा बजाज । ८० के दशक में बजाज के स्कूटर्स बहुत ही कामयाब थे । ९० के दशक में ओपन मार्केट ग्लोबलाइज़ेशन का दौर शुरू हो गया । होंडा, यामाहा जैसे अनेकों इण्टरनैशनल ब्रँड बाज़ार में आने लगे । बेहतर टेक्नोलॉजी, डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क और किफ़ायती क़ीमत के कारण इन मोटरसाइकिल की बिक्री तेज़ी बढ़ने लगी और बजाज स्कूटर्स की बिक्री लगातार कम होने लगी । २००० साल बजाज ऑटो के लिए बहुत बूरा साबित हुआ ।
तभी राजीव बजाजने कंपनी में बड़े बदलाव लाने का फ़ैसला किया । अल राइज़ और जैक ट्राउट की एक बुक हैं “22 Immutable Laws of Marketing” जिसमें एक लॉ हैं “Law of sacrifice”.
कंपनी के बेहतरी के लिए आपको कुछ चीज़ें छोड़नी होतीं हैं sacrifice करनी होती हैं । बजाज ने स्कूटर्स का प्रॉडक्शन पूरी तरह से बंद करने का फ़ैसला किया । और अपना पुरा फ़ोकस मोटरसाइकिल पर केंद्रित करने का फ़ैसला ले लिया ।
यह बहुत बड़ा फ़ैसला था । क्यों की बजाज और बजाज स्कूटर का एक अटूट सा नाता था । अनेक विरोधों के बावजूद राजीव बजाज अपने फ़ैसले पर अटल रहे । उनका मानना था की मैकडोनाल्ड बस एक वडापाव बेचकर और स्टारबक्स एक कटिंग चाय बेचकर भी इतनी बड़ी कंपनियाँ बनीं हैं ।
उनका यह फ़ैसला रंग लाया । बजाज ऑटो ने ख़ुद विकसित की बजाज पल्सर बाईक को बेहतरीन कामयाबी मिली । बजाज ने डिस्कवर एवेंजर बॉक्सर और अब केटीएम हक्सवर्ना जैसी कामयाब मोटरसाइकिल्स पेश की । आज ७० के क़रीब देशों में बजाज की मोटरसाइकिल एक्सपोर्ट होती हैं और कंपनी की ५० प्रतिशत से भी ज़्यादा आय इनकम इस निर्यात से हो रही हैं ।
बजाज ऑटो के कामयाबी का एक कारण the law of sacrifice भी हैं ।