“फिर? फिर क्या हुआ?”
मेरी बेटी के आश्चर्य से खुलीं बड़ी बड़ी आँखें देखकर मैं अपने चेहरे पे और भी ज़्यादा डरावने भाव लेकर आगे बताने लगा, “इतनासन्नाटा था वहाँ और उसमें अमावस की रात... कुछ नहीं दिख रहा था... तभी दूर से छन छन आवाज़ आने लगी?”
“फिर?” बेटा ।
“मैं थोड़े ही डरने वाला था। मैं पीपल के पेड़ के पास गया... हवाएँ और तेज़ हो गयी थी...”
“चाय पी लीजिए ।” पत्नी बोली । मैंने ग़ुस्से से उसे देखा । ये हमेशा मूड ख़राब कर देती हैं ।
“बताओ ना प्लीज़...” बेटी ।
चाय की प्याली उठाकर मैंने जैसे ही होंठों से लगायी, मेरा लंगोटिया यार आ गया ।
“कभी तो फ़ोन उठाया कर यार ।” दोस्त बोला ।” भाभीजी, एक चाय मेरे लिए भी ।”
“अरे, बच्चों को अपनी बचपन की कहानी सुना रहा था ।” मैं बोला ।
“कौनसी कहानी? मैं भी तो सुनूँ ।” दोस्त ।
“ कुछ नहीं यार ।” मैं विषय बदलते बोला ।
“वहीं कहानी आपके बचपन की । आप सब दोस्तों की । अमावस्या की रात पिपल के पेड़ को छूकर आने की ।” मेरी बेटी बोली ।
मैं मित्र से बोला, “वह कहानी मैं बाद में बताता हूँ । और बताओ क्यों फ़ोन कर रहे थे ।
मेरी बातों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ करते दोस्त बोला,” वह कहानी? तुम्हारा बाप इतना डर गया था की बीच में ही भागकर वापस आगया था । उस के बाद अगले कितने दिन रात को घर से बाहर भी निकलता था । क्यों बराबर ना मेरे दोस्त?”
मेरे बच्चे मेरे दोस्त के साथ ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे और उस में चाय लेकर आ रहीं मेरी पत्नी भी शामिल हुई ।
मैं दोस्त को ग़ुस्से से देखकर यहीं सोच रहा था,” साला, ये दोस्त तो बहुत कमीने होते हैं ।”
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प्रमोद वाघमारे Pramod Waghmare
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