वह अब अपने चाचा के साथ आया था । उसकी बातचीत में वहीं हेकड़ी ।
चाचा बोले, “ देखो अब कोर्ट का फ़ैसला भी कल हमारे हक़ में आनेवाला है । बेटे कीं कस्टडी इसके पास ही जायेगी । शांति से विचारकर लें । वापस चल । सब ठीक हो जाएगा ।”
मेरे सामने मेरी लाईफ़ के पिछले आठ साल मुझे किसी फ़िल्म की तरह नज़र आए ।
शादी, हम दोनों इंजीनियर, सॉफ़्टवेयर कंपनी मैं दोनों के जॉब्स, एक साल में बच्चा, मेरा नौकरी में बढ़ता यश और साथ में तेज़ी सेप्रमोशन्स, उसका बढ़ता चिड़चिड़ापन, विद्वेष । सब के सामने मुझे अपमानित करना, मुझे नीचा दिखाना ।
उसकी हेकड़ी, उसका अहंकार ।
पिछले साल मुझे सब असह्य हो गया और मेरे बेटे के साथ मैंने घर छोड़ दिया । कल कोर्ट में फ़ैसला आने वाला था ।
वह,” देख ले । हमेशा की तरह पागलपन मत कर । तुम हारोगी । साथ में बेटे की कस्टडी मुझे ही मिलेगी ।”
मैं मेरे बेटे के सिवाय कैसे जी पाऊँगी? मुझे वापस जाना ही पड़ेगा । मैं बैग भरकर बाहर आ गयी ।
फिर से मेरे कानों में उसके शब्द गुंजें । फिर से याद आया मुझे उसका अहंकार, उसने हर पल किया हुआ मेरा अपमान । वह वहीं पुरूषथा । वह बिल्कुल बदला नहीं था ।
और मेरे पैर वहीं रूक गये ।
प्रमोद वाघमारे Pramod Waghmare
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